अभिशप्त's image
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पर्वत न हुआ, निर्झर न हुआ,
सरिता न हुआ, सागर न हुआ,
क़िस्मत ऐसी लेकर आया
जंगल न हुआ, पांतर न हुआ।

जब-जब नीले नभ के नीचे
उजले ये सारस के जोड़े,
जल बीच खड़े खुजलाते हैं
पाँखें अपनी गर्दन मोड़े,

तब-तब आकुल हो उठता मन,
कितना अभिशप्त मिला जीवन!
जलचर न हुआ, जलखर न हुआ,
पुरइन न हुआ, पोखर न हुआ।

जब-जब साखू बन में उठते
करमा की धुन के हिलकोरे,
मादल की थापों के सम पर
भाँवर देते आँचल कोरे,

तब-तब पागल हो उठता मन
किस अर्थ मिला ऐसा जीवन?
पायल न हुआ, झाँझर न हुआ,
गुदना न हुआ, काजर न हुआ।

जब-जब झोंपड़ियों की बस्ती
बनती है सावन की रानी,
गदराए तन नर्तन करते
बादल होता पानी-पानी,

तब-तब सोचा करता है मन
कितना असमर्थ हुआ जीवन?
झूला न हुआ, झूमर न हुआ,
कजरी न हुआ, चाँचर न हुआ।

जब-जब आकर दस्तक देता
कोई अनपहचाना गुंजन,
प्राणों के बंद किवाड़ों की
बजने लगती साँकल झन-झन,

तब-तब पूछा करता है मन
कितना अनमिल मेरा जीवन?
बाहर जो था, भीतर न हुआ,
भीतर जो था, बाहर न हुआ।

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