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उम्र काटी बुतों की आड़ों में

Muztar KhairabadiMuztar Khairabadi
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उम्र काटी बुतों की आड़ों में

बन के पत्थर रहा पहाड़ों में

वो लड़ाई में बोल उठे मुझ से

बात अच्छी बनी बिगाड़ों में

दर्द-ए-सर के इलाज को वहशत

खींच कर ले चली पहाड़ों में

मस्तियाँ और बहार का मौसम

मय की लज़्ज़त गुलाबी जाड़ों में

दुख़्तर-ए-रज़ की शर्म तो देखो

छुप गई जा के ख़ुम की आड़ों में

तू ने पी ही नहीं है ऐ ज़ाहिद

मय की गर्मी न पूछ जाड़ों में

तेरे गेसू भी हो गए शामिल

मेरी तक़दीर के बिगाड़ों में

मर्ग-ए-दुश्मन पे मौत रोती है

ये असर है तिरी पछाड़ों में

उठते जोबन पे खुल पड़े गेसू

आ के जोगी बसे पहाड़ों में

वो गले से लिपट के सोते हैं

आज-कल गर्मियाँ हैं जाड़ों में

इश्क़ में जान पर बनी 'मुज़्तर'

ज़िंदगी कट गई बिगाड़ों में

 

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