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कभी ऐ हक़ीक़त

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में

कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मिरी जबीन-ए-नियाज़ में

तरब-आशना-ए-ख़रोश हो तो नवा है महरम-ए-गोश हो

वो सरोद क्या कि छुपा हुआ हो सुकूत-ए-पर्दा-ए-साज़ में

तू बचा बचा के न रख इसे तिरा आइना है वो आइना

कि शिकस्ता हो तो अज़ीज़-तर है निगाह-ए-आइना-साज़ में

दम-ए-तौफ़ किरमक-ए-शम्अ ने ये कहा कि वो असर-ए-कुहन

न तिरी हिकायत-ए-सोज़ में न मिरी हदीस-ए-गुदाज़ में

न कहीं जहाँ में अमाँ मिली जो अमाँ मिली तो कहाँ मिली

मिरे जुर्म-ए-ख़ाना-ख़राब को तिरे अफ़्व-ए-बंदा-नवाज़ में

न वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ न वो हुस्न में रहीं शोख़ियाँ

न वो ग़ज़नवी में तड़प रही न वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ मैं

मैं जो सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा

तिरा दिल तो है सनम-आश्ना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में

 

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