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हादसा वो

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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हादसा वो जो अभी पर्दा-ए-अफ़्लाक में है

अक्स उस का मिरे आईना-ए-इदराक में है

न सितारे में है ने गर्दिश-ए-अफ़्लाक में है

तेरी तक़दीर मिरे नाला-ए-बेबाक में है

या मिरी आह में ही कोई शरर ज़िंदा नहीं

या ज़रा नम अभी तेरे ख़स-ओ-ख़ाशाक में है

क्या अजब मेरी नवा-हा-ए-सहर-गाही से

ज़िंदा हो जाए वो आतिश जो तिरी ख़ाक में है

तोड़ डालेगी यही ख़ाक तिलिस्म-ए-शब-ओ-रोज़

गरचे उलझी हुई तक़दीर के पेचाक में है

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