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अता हुई है तुझे रोज़

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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अता हुई है तुझे रोज़ ओ शब की बेताबी

ख़बर नहीं कि तू ख़ाकी है या कि सीमाबी!

सुना है ख़ाक से तेरी नुमूद है लेकिन

तिरी सरिश्त में है कौकबी ओ महताबी!

जमाल अपना अगर ख़्वाब में भी तू देखे

हज़ार होश से ख़ुश-तर तिरी शकर-ख़्वाबी

गिराँ-बहा है तिरा गिर्या-ए-सहर-गाही

इसी से है तिरे नख़्ल-ए-कुहन की शादाबी!

तिरी नवा से है बे-पर्दा ज़िंदगी का ज़मीर

कि तेरे साज़ की फ़ितरत ने की है मिज़्राबी!

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