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ऐ अहल-ए-नज़र

Muhammad IqbalMuhammad Iqbal
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ऐ अहल-ए-नज़र ज़ौक़-ए-नज़र ख़ूब है लेकिन

जो शय की हक़ीक़त को न देखे वो नज़र क्या!

मक़्सूद-ए-हुनर सोज़-ए-हयात-ए-अबदी है

ये एक नफ़स या दो नफ़स मिस्ल-ए-शरर क्या!

जिस से दिल-ए-दरिया मुतलातिम नहीं होता

ऐ क़तरा-ए-नैसाँ वो सदफ़ क्या वो गुहर कया!

शायर की नवा हो कि मुग़न्नी का नफ़स हो

जिस से चमन अफ़्सुर्दा हो वो बाद-ए-सहर क्या!

बे-मोजज़ा दुनिया में अभरतीं नहीं क़ौमें

जो ज़र्ब-ए-कलीमी नहीं रखता वो हुनर क्या!

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