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वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें

Muhammad Ibrahim ZauqMuhammad Ibrahim Zauq
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वक़्त-ए-पीरी शबाब की बातें

ऐसी हैं जैसे ख़्वाब की बातें

 

फिर मुझे ले चला उधर देखो

दिल-ए-ख़ाना-ख़राब की बातें

 

वाइज़ा छोड़ ज़िक्र-ए-नेमत-ए-ख़ुल्द

कह शराब-ओ-कबाब की बातें

 

मह-जबीं याद हैं कि भूल गए

वो शब-ए-माहताब की बातें

 

हर्फ़ आया जो आबरू पे मिरी

हैं ये चश्म-ए-पुर-आब की बातें

 

सुनते हैं उस को छेड़ छेड़ के हम

किस मज़े से इताब की बातें

 

जाम-ए-मय मुँह से तू लगा अपने

छोड़ शर्म ओ हिजाब की बातें

 

मुझ को रुस्वा करेंगी ख़ूब ऐ दिल

ये तिरी इज़्तिराब की बातें

 

जाओ होता है और भी ख़फ़क़ाँ

सुन के नासेह जनाब की बातें

 

क़िस्सा-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार दिल के लिए

हैं अजब पेच-ओ-ताब की बातें

 

ज़िक्र क्या जोश-ए-इश्क़ में ऐ 'ज़ौक़'

हम से हों सब्र ओ ताब की बातें

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