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चन्द्रवर्णी रात जैसे कोई प्रेमकथा

Kuber Nath RaiKuber Nath Rai
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(१)
चन्द्रवर्णी रात जैसे कोई प्रेमकथा
दूर किसी गाँव में गोकुल के
विलखता है एक स्वप्न प्रति रात
लिखते हैं ताल-पत्र उसे पुनः-पुनः
हवा दुहराती है बार-बार और
नाम ले ले उलूक करुण रव करते हैं
रात जैसे कोई भूली कथा।

(२)
चन्द्रवर्णी रात जैसे श्रीमद्भागवत
मन्द-मन्द फागुनी डोलती है
अश्वत्थ ध्यान तन्मय है
ज्योत्स्ना-हत जम्बुक कंठों ने
अभी-अभी ब्रह्मसूत्र पाठ किया;
फागुन की अर्धरात बाँसुरी
सारा वृन्दावन जग गया
रात ज्यों श्रीमद्भागवत।

(३)
चन्द्रवर्णी रात ज्यों मानस स्नान
मन्द मारुत शय्या पर सो रहा
ध्यान एक; देव लोक उतरा है,
राशि-राशि श्वेत पद्म-पाँखुरी।
कि डूब गये सारे घाट-बाट
तारों का अरूप सुर रात का
श्लोक पट झिलमिल बुनता है
रात ज्यों दिव्य दृष्टि स्नान।

(४)
चन्द्रवर्णी रात ज्यों मन मधु कानन
चिकमिक बुंदकी चोला और चन्दन
नासिका पर रसकसी, दुग्धफेन वसन
दीठ बनी गोपी अभिसारिका
भूली पर बाट; मायावी था कानन
विलख रही माधव की मुरली
अब तो तू गल जा ओ हिया पाहन
रात ज्यों विह्वल वृन्दावन।

 

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