बंधुआ मजदूर's image
1 min read

बंधुआ मजदूर

Kailash VajpeyiKailash Vajpeyi
0 Bookmarks 92 Reads0 Likes


अरे तू काहे को रोता है
यहाँ कुछ ख़त्म नहीं होता
छूट रही नहीं कोई संपदा
यों ही बेमतलब क्यों
कीचड़ बिलोता है.
भीतर से बाहर तक
ख़ाली ही ख़ालीपन जगमग था
आग,हवा,पानी को तरस आ गया
शक्ल पा गया तू
कोशिश किये बिना
जोड़ किये ठीकरे
छत डाल ली
जहाँ देह तक किस्री और की मेहेर हो
डर मरने का बेमानी है
असल में दोष नहीं दो दीदों का
आदम की नस्ल
तीसरी आँख से कानी है.
रोज़ जाल बुनता है
सर धुनता तू / देखकर / चौपट
यह धंधा हड्डी की खाल का
चोला तो लेकिन
बचुआ हमेशा से
ब‍ंधुआ मज़दूर है
काल का.

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts