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यूँ मुझे आप से अब करती है तक़दीर जुदा

IMAM BAKHSH NASIKHIMAM BAKHSH NASIKH
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यूँ मुझे आप से अब करती है तक़दीर जुदा

जिस तरह जंग में हो क़ब्ज़े से शमशीर जुदा

मस के ज़र होने से बेहतर है कमाल-ए-इंसाँ

ख़ाकसारी है जुदा और है इक्सीर जुदा

जा-ए-दंदाँ लब-ए-सोफ़ार हुए ऐ क़ातिल

दहन-ए-ज़ख़्म से होगा न तिरा तीर जुदा

मरज़-ए-इश्क़ में पीठ अपनी ये बिस्तर से लगी

न कभी सफ़हा से जिस शक्ल हो तस्वीर जुदा

ऐ जुनूँ पाँव हैं जब तक ये तमन्ना है मुझे

कभी मानिंद रगों के न हो ज़ंजीर जुदा

छोड़ूँ क्या पीरी में शीरीं-दहनों की सोहबत

नहीं मुमकिन कि हों मिल कर शकर-ओ-शीर जुदा

कहते हैं देख के ज़ुल्फ़ उस के रुख़-ए-ताबाँ पर

कभी होता नहीं उस शम्अ' से गुल-गीर जुदा

जब जुदाई के मज़ामीन मुझे सूझे हैं

हर्फ़ से हर्फ़ हुआ है दम-ए-तहरीर जुदा

क्यूँ न हो जल्वा-ए-ख़ुर्शेद से साए का वजूद

क्या तिरे चेहरे से हो ज़ुल्फ़-ए-गिरह-गीर जुदा

मुझ गिरफ़्तार-ए-जुदाई के जो पाँव में पड़ी

हो जुनूँ हल्क़े से हर हल्क़ा-ए-ज़ंजीर जुदा

मैं ने जो दर्द-ए-जुदाई से किए हैं नाले

कीजिए तन से मिरा सर प-ए-ताज़ीर जुदा

तेग़-ए-आहन से सिवा है बुरिश-ए-तेग़-ए-ज़बाँ

हक़ को बातिल से करेगी तिरी तक़रीर जुदा

आश्ना मुत्तहिद इस दर्जा कहाँ होते हैं

आप दिल-गीर है 'नासिख़' जो है दिल-गीर जुदा

 

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