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अनबींधे मन का गीत

Girija Kumar MathurGirija Kumar Mathur
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अनबींधे मन का गीत
जल तो बहुत गहरा था
कमलों तक समझे हम

झील वह अछूती थी
पुरइन से ढंकी हुई
सूरज से अनबोली
चाँद से न खुली हुई
कई जन्म अमर हुए
कोरी अब सिर्फ देह
पहली ही बिजली
हमें नौका-सी बाँध गई

लहरें किन्तु भीतर थीं
रोओं तक समझे हम

तट से बंधा मन
छाया कृतियों में मग्न रहा
स्वप्न की हवाओं में
तिरती हुयी गन्ध रहा
अतल बीच
सीपी का ताला निष्कलंक रहा
जादू का महल एक
नीचे ही बन्द रहा

अनटूटा था तिलिस्म
बाँहों में समझे हम

एक दिन शुरू के लम्बे कुन्तल
खुले दर्पण में
भिन्न स्वाह लिपि देखी
प्यासे आकर्षण में
मन था अनबींधा
बिंधी देहों के बन्धन में
अंजलियां भूखी थीं
आधे दिए अर्पण में

आया जब और चाँद
झील की तलहटी में
तब मीठी आँखों के
अर्थों को समझे हम

जल तो बहुत गहरा था
कमलों तक समझे हम ।

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