अव्वल तो तिरे कूचे में आना नहीं मिलता's image
1 min read

अव्वल तो तिरे कूचे में आना नहीं मिलता

Ghulam HamdaniGhulam Hamdani
0 Bookmarks 48 Reads0 Likes

अव्वल तो तिरे कूचे में आना नहीं मिलता

आऊँ तो कहीं तेरा ठिकाना नहीं मिलता

मिलना जो मिरा छोड़ दिया तू ने तो मुझ से

ख़ातिर से तिरी सारा ज़माना नहीं मिलता

आवे तो बहाने से चला शब मिरे घर को

ऐसा कोई क्या तुझ को बहाना नहीं मिलता

क्या फ़ाएदा गर हिर्स करे ज़र की तू नादाँ

कुछ हिर्स से क़ारूँ का ख़ज़ाना नहीं मिलता

भूले से भी उस ने न कहा यूँ मिरे हक़ में

क्या हो गया जो अब वो दिवाना नहीं मिलता

फिर बैठने का मुझ को मज़ा ही नहीं उठता

जब तक कि तिरे शाने से शाना नहीं मिलता

ऐ 'मुसहफ़ी' उस्ताद-ए-फ़न-ए-रेख़्ता-गोई

तुझ सा कोई आलम को मैं छाना नहीं मिलता

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts