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दिल में फिर वस्ल के अरमान चले आते हैं

Bekhud DehlviBekhud Dehlvi
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दिल में फिर वस्ल के अरमान चले आते हैं

मेरे रूठे हुए मेहमान चले आते हैं

उन के आते ही हुआ हसरत-ओ-अरमाँ का हुजूम

आज मेहमान पे मेहमान चले आते हैं

आप हों हम हों मय-ए-नाब हो तन्हाई हो

दिल में रह रह के ये अरमान चले आते हैं

उस ने ये कह के मुझे दूर ही से रोक दिया

आप से जान न पहचान चले आते हैं

रूठ बैठे हैं मगर छेड़ चली जाती है

कभी पैग़ाम कभी पान चले आते हैं

ये रहा हज़रत-ए-'बेख़ुद' का मकाँ आओ चलें

अभी दम भर में मिरी जान चले आते हैं

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