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ओ आदर्श कवि!

अपनी कला में माना तुम निपुण!

कई दफा बने तुम समाज का दर्पण,

माना जागरूक नागरिक होने का तुम पर दायित्व!

विचार के अंकुरण का खोजते तुम शोध से अस्तित्व,

करते हो अपनी तलवारनुमा कलम से वार,

क्या गज़ब का पाया भई तुमने ये हथियार!

ओ आदर्श कवि!

कभी काव्य में करते हो परिहास का मिश्रण,

कलात्मक अभिव्यक्तियों का भी करते तुम श्रवण,

तुम राजनीतिक मुद्दों पर रखते अपनी बात,

गुज़ारते रहस्य में अकेले ही अपनी तन्हा रात,

फिर रचते हो कोई नया बेहतरीन सा अजूबा,

कभी तो ज़िक्र में आ जाती वो मेहरीन सी महबूबा,

ओ आदर्श कवि!

तुम कभी ठहर जाते आंककर खुदको कम,

कुछ देर लगे तो भले आंखें कर लेते अपनी नम,

जिंदगी से मिली तुम्हें संजो सकने की दौलत,

ना सोचते कभी कितनी दी तुम्हें ऊपरवाले ने मोहलत,

कभी लिखते मग्न होकर, कभी प्रेम में डूबकर,

ऐसे ही बुनते रहते हो तुम रचनाओं को शब्द चुनकर!

ओ आदर्श कवि!

तुम बचपना भी क्या खूब तरह से दर्शाते,

अपने अनुभवों से पाठकों को बहुत लुभाते!

अपने रिश्तों का वर्णन करते संजीदगी के संग,

हर रचना में झलकता तुम्हारे अंतर्लीन करने का ढंग,

लम्हों को तुम पूरे जगत संग निष्पक्ष रह बांटते,

तुम जानते जिंदगी तस्सलियों संग भी कैसे काटते!


- यति









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