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अब तो हादसों पर भी हंसी आती है 
जिंदगी इस कदर क्यों आज़माती है
                     ***
औरों से करके ज़िक्र उनको बदनाम भी नहीं करता
अब तो हादसे की किसी को ख़बर भी नहीं करता 
                  *****
इंसानों में इंसानियत अब कहां बाकी रही है
अब तो दहशत खुलेआम मुस्कुरा रही है
                 *****
अब तो रोज़ कत्ले-ए-आम होता है
क्या जिंदगी हमारी आम हो गई है
                *****
ज़िंदा नज़र तो आते हैं मगर हकीकत में है नहीं
मुर्दों पे क्या मलाल करना जिंदा तो वो है नहीं 
                 *******
सुकून ए नींद अब कहां मयस्सर है 
मेरे हिस्से में एक रकीब आ गया है
                  *****
    (वकी.के)

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