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"कर्म युद्धपथ" - विवेक मिश्र

विवेक मिश्रविवेक मिश्र July 17, 2022
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विनय न मानने पर क्रुद्ध होना राम का अधिकार है,
विश्व शांति लक्ष्य पर बुद्ध का मुस्कुराना स्वीकार है,
है परमात्मा अंश आत्मा धर्मयुद्ध जिसका श्रृंगार है,
हो न चिंतित पार्थ किंचित जब संग में पालनहार है,

छोड़ मत यूँ गांडीव को सम्मुख शत्रु की ललकार है,
यहाँ न कोई रिश्ता नाता आत्मा शुद्ध व निर्विकार है,
बढ़ कर वर ले विजयमाल तू तो धर्म का पहरेदार है,
 हो न चिंतित पार्थ किंचित जब संग में पालनहार है,

काट बंधन मोह के माथ लटकी वक्त की तलवार है,
जगा आत्मबल चल आत्म संग ये वक्त की पुकार है,
आत्मा है शुद्ध शाश्वत आत्मतत्व से जय जयकार है,
हो न चिंतित पार्थ किंचित जब संग में पालनहार है,

तू आया क्यूँ व कैसे सोच न जाना अब किस पार है,
तू निमित्त हूँ मैं कर्ता और कर्मफल मुझे अंगीकार है,
चक्र सुदर्शन काली खप्पर मेरा व मुझसे ही संहार है,
हो न चिंतित पार्थ किंचित जब संग में पालनहार है,

- विवेक मिश्र

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