लड़की थी वो's image
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घर की लाडली थी वो, थोड़ी सी बावली थी वो।
पहली किरण के साथ एक नया अर्श पालती थी वो ।
अनजान थी रिवाजों से, खुद ख्वाब ढालती थी वो ।
सपने हज़ार थे उसके, उन सपनों में खुद को झांकती थी वो ।
कुछ दरिंदो ने नोचा था उसे, बस इज्जत की बानगी थी वो ।
फटे कपड़े नुचा जिस्म गवाह है, लड़ना जानती थी वो ।
काश की उसके दिल की आवाज वो रहनुमा सुन पाता ।
उन जालिमों के लिए कैसी सजा चाहती थी वो ।
वो तो चली गई उसे तो जाना था, चलो अच्छा हुआ ।
निर्भया, गुड़िया, जीशा, खुशी, सब बनना चाहती थी वो ।
ज़रा शर्म करलो गर जमीर जिंदा है तुम्हारा,
अबला नहीं किसी की आबरू थी, लड़की थी वो लड़ सकतीं थी वो।।।

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