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ना ना माँ, ना ना बाबा, वो मैं नहीं हूँ

Virag DhuliaVirag Dhulia December 2, 2021
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ना ना माँ, ना ना बाबा, वो मैं नहीं हूँ 


वो कौन हैं खबरें जिनकी छपती अखबारों में 

वो कौन हैं होते जिनके चर्चे खाट चौबारों में 

जिनके कारनामें मिसाल बन जाती कानूनों की 

जिनकी हरकतों से रौशनी तेज़ होती वकीलों की दुकानों की 

वो मुजरिम, वो गुनेहगार, वो खुरापाती दिमाग किसका है 

वो जिसका निशाँ मिटा दिया गया वो सुराग किसका है 

घबराना नहीं तुम वो खानदान का कलंक में नहीं हूँ 

ना ना माँ, ना ना बाबा, वो मैं नहीं हूँ 


वो जो थोड़े से पैसों के लिए कर दे सौदा ज़मीर का 

वो जो दोस्त को थमा दे ज़हरीला प्याला क्षीर का 

वो जो दंतहीन दिखे पर निकले अंत में साँप आस्तीन का 

वो जो कभी तो बहरूपिया बन जाये या लगे मेहजबीन सा 

वो जो लिपट जाए वृक्ष चन्दन से विषैला भुजंग सा 

वो जो छिप जाए धूप भरी वर्षा में सतरंग सा 

उस जयचंद की नस्ल से वाबस्ता मैं नहीं हूँ 

ना ना माँ, ना ना बाबा, वो मैं नहीं हूँ  


वो जो खैरखा बन के फाश करवा जाता दिल के सारे राज़ 

वो जिसने कपट का किया अभ्यास ओढ़ के निराला अंदाज़ 

वो कौन है किया जिसने मजबूर सब को सावधान होने पर 

वो कौन है जिसने डर को निरंतर बना रखा समाधान होने पर 

जब सब ही अलापते पकडे जाने पर विवशता का राग 

तो वो कहाँ है जिसने जलाया गुनाह की कोठरी का पहला चिराग 

जब सारे ही अंत खेल मैं कहते हैं वो मैं नहीं हूँ 

बचपन में गेंद से कांच को तोड़ मैंने भी कहा वो मैं नहीं हूँ 

धुएँ की ओट में रंगे हाथों पकड़ा गया पर वो मैं नहीं हूँ 

गली के वो आवारा जिन्होंने मचाया उधम वो मैं नहीं हूँ 

ना ना माँ, ना ना बाबा, वो मैं नहीं हूँ   


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