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वो गर्मियों की छुट्टियां

तुषार "बिहारी"तुषार "बिहारी" April 30, 2022
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सितम ढहाती ये गर्मी, कहर बरसाती ये गर्मी,
अपने उच्च ताप से, सबको झुलसाती ये गर्मी ।

कहां गई वो गर्मियां, जिसमें बचपन खेला करता था,
गर्मियों की छुट्टियों का आनंद, उसी गर्मी में मिला करता था ।
बीत गया वो दौर, याद आती है सिर्फ यादें,
जब सुबह होते ही बच्चों का, काफिला निकला करता था ।

अब कहां वो गर्मियों की छुट्टियां, अब कहां वो गलियों में चहल पहल,
जब बच्चों का क्रिकेट टूर्नामेंट, गलियों में हुआ करता था ।

थक कर पसीनों से लतपत हम, जब घर आते थे, तो माँ डांटा करती थी,
अपने कोमल आंचल से, हमारे पसीनोंं को पोंछा करती थी ।

पापा से करूंगी शिकायत, ऐसा वो कहती थी, 
लेकिन उनके सामने आते ही, वो कुछ भी ना कहती थी ।

इस बात का फिर से हम, फायदा उठाया करते थे,
थामे हाथ में बल्ला- बॉल, फिर से खेलने जाया करते थे ।

अब वो नालें कहां, जिसमें बॉल गिरा करती थी,
फिर से वही गंदी बॉल, हमारे हाथों में हुआ करती थी ।

जो अनेकों बीमारियां आज है, उस वक्त कहां हुआ करती थी,
खुशी से गले मिलते थे, जब कोई विकेट गिरा करती थी । 

अब कहां वो गर्मियां, जब गलियों से आवाज आया करती थी,
कुल्फी वाला, गोले वाला, वो आवाज सबको लुभाया करती थी ।

अब वो दौर है, जहां गलियों में सूनापन रहता है,
हर एक बच्चें के हाथ में अब, मोबाइल जो रहता है ।

बीत जाता है पूरा दिन, उसी मोबाइल के साथ ही,
राह देखती तुम्हारी गलियां, अपने सूनेपन के साथ ही ।

कई आवाजें देकर वो, अब थक सा जाता है,
पता नहीं कब कुल्फी वाला, आकर चला जाता है ।

मैं जब भी गुजरा उन गलियों से, वो अक्सर पूछा करती थी,
कहां गए वो तेरे यार पुराने, जिनसे रौनक हुआ करती थी ।

वो गर्मियों की छुट्टियां मुझे, बहुत याद आती है,
आज कल की गर्मियां तो सिर्फ, अपने ताप से जलाती है ।

: तुषार "बिहारी"

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