मेरा स्वयं से सामना's image
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जब मेरा स्वयं से सामना हुआ,

उसने पूछा; अब कैसे आना हुआ ?

मैंने कहा; जरूरत आ पड़ी है तुम्हारी,

वो बोला; तुम इंसानों की ये आदत है पुरानी ।

मैंने कहा; आदत ही ठीक, पर आया तो सही,

वो बोला; छोड़ दे ये आदत, ये आदत सही नहीं ।

मैंने कहा; आदत छोडूं तो छोडूं कैसे, तू बता तो जरा,

वो बोला; भूल जा तू खुद को, इसमें है तेरा भला ।

मैंने कहा; इतना आसान नहीं है जितना आसान लगता है,

वो बोला; ठीक है तू जा, यहां ज्ञान नहीं बटता है ।

मैंने कहा; बड़ा निर्दयी है तू, इतना भी साथ दे नहीं सकता,

वो बोला; साथ तो तेरे हर वक्त हूं पर तू ही साथ नहीं चलता ।

मैंने सोचा मन ही मन में बोला तो ये सही है,
हमारे साथ है फिर भी इसको समझा ही नहीं है ।

अब जो मुझे समझना था वो मैंने समझ लिया,

खुद का ज़मीर ही सब कुछ है बाकी सब बुझता दीया ।

निष्कर्ष : स्वयं को जानने के लिए खुद को भूलना पड़ता है ।

: तुषार "बिहारी" 

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