सिलसिला's image
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ज़िन्दगी के सफर में यूं चलते रहे,

जिस्म ढलता रहा,ख्वाब पलते रहे।

जो भी पाया उसे अपना हक मान कर,

ना मिला जो, उसी को मचलते रहे।।


उम्र बढ़ती गई, शौक घटते गये,

मित्र भी एक एक करके कटते गए।

रास्ते तो जुदा सबके होने ही थे,

हाथ छूटे सहज, ख्वाब बंटते गए।।


जिनको हर मोड़ पर था सहारा दिया,

उनने भी धीरे धीरे किनारा किया।

साथ में जो रहे,साथ उनके सदा,

ज़िन्दगी की डगर पर गुजारा किया।।


कोई मजबूर है, कोई मगरूर है,

इस जमाने का ये सिलसिला आम है।

किसको फुर्सत, पलट के जो देखे इधर,

सबको अपने ही कामों से बस काम है।।


साथ मिलकर जो खाईं,किये जो कभी,

सारी कसमें, वो वादे हवा हो गए।

दोस्तों में दिखी दुश्मनी की झलक,

दोस्ती के इरादे हवा हो गए।।


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