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मानुष लाख चतुर सही 
गर गोविंद ना दें राह दिखाएं 
भटक-भटक कर सब चतुराई 
मानुष की 
नीर बन बह जाए 
हमरी भी कुछ उलझन है 
अब तुम्ही दो सुलझाए 
सुमार्ग की पहचान हमें तो करवाएं

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