मां's image
Share0 Bookmarks 40 Reads1 Likes
तुम बहुत खूबसूरत लगती हो
जब करती हो सादगी का श्रृंगार,
जब लेती हो स्थिरप्रग्य अवतार ,
और फिर जब बना लेती हो श्रुतियों को अलंकार
सच में ,
तुम बहुत खूबसूरत लगती हो
ये लगना कितना अज़ब है
और होना कितना गजब है
कभी कभार या ज़ार बार ,
जब करती हो असत्य का तिरस्कार
सच .....
दे जाती हो भावनाएं हजार
और फिर वो भावनाएं कर जाती हैं ,
मेरे गलतियों में सुधार ,
अनगिनत बार
असंख्य अदम्य अतुल्यनीय बढ़ जाती,
है शोभा,
तुम्हारे श्रृंगारों की
तुम तब स्वयं से भी अद्भुत लगती हो
शायद कुछ भी नहीं तुम ,
पर मेरी गिनती की
शून्य भी तुम ,
अनंत भी तुम लगती हो
और फिर एक नई परिभाषा गढ़ती हो
कि तुम बहुत ही खूसूरत लगती हो।

- श्रुति "अलंकार "


No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts