मइया, तुम क्यों बेचैन हो?'s image
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मैं भयभीत, अबोध, अज्ञानी 


अनभिज्ञ निज संसार से


हर बार ही घायल हुआ


हर वक्त के प्रहार से




और लिप्तता इतनी सघन 


है विषयों के विस्तार से


एकरूप जैसे हुआ कोई


जगत के निस्सार से




आकर दूर कोसों बसा


निज अंतस् की पुकार से


और पोषित हो रहा


विषरूपी विषय आहार से




पर तुम!


तुम क्यों बेचैन हो?


तुम तो देती चैन हो


तुम तो पाप हारिणी


तुम तो मुक्ति वाहिनी


भवसागर पार तारिणी


तुम क्यों बेचैन हो?






सदियों से तुम्हारी जल धार


बह रही है लगातार


जो करती आई है उद्धार


अगणित जन का बार-बार




तुम्हारी जलधार में इतनी गति किसके लिए है?


ये व्याकुलता मिलन की किसके प्रति है?




किस प्रियतम की विरह वेदना


सहती तुम दिन रैन हो?


और जिसके लिए आज तुम 


खोती अपना चैन हो?




सागर मेरा है वो प्रियतम


जिसके लिये मेैं अकुलाती


तज मोह आज सारे बंधन से


उससे मिलने को जाती




तट पर भेज निरत ही लहरें


संदेश तुम्हें भी पहुँचाती


तुम कैसे स्थिर हो भव में


नहीं पिया की याद सताती?




क्या हो और क्या बन बैठे हो,


नहीं दया खुद पर आती?


मीन तजे निज प्राण नीर बिन


है कैसे श्वास तुम्हारी आती?




मिथ्या आस तजो इस भव से


पथ आगे मैं दिखलाउँगी


जैसे अब तक तारे अगणित


तुम्हें भी पार लगाउँगी




रहो सतर्क सदा ही हर क्षण


दिन प्रतिदिन के आचार से


अग्रिम पथ प्रशस्त स्वतः होगा


निज बोध के प्रकाश से




बहता निर्मल नीर माँ तेरा


कितना कुछ कह जाता है


दोषों के पर्वत के संग ही


कदम 'सुकून' बढ़ाता है




~सुनील कुमार निरंजन ‘सुकून’


#ऋषिकेश


#गंगाजी



Listen Here:

https://youtu.be/4XeZSOr0TSU

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