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अकेला खड़ा था जब मुस्किल घड़ी थी

कारवाँ खुद जुड़ गया कामयाबी के आते ही

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कलम जिनकी ग़ुस्ताख़ होती है

अक्सर सर उनके कलम होते हैं 

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मैं उन्हें जीवन का संघर्ष सुना रहा था

वो कहानी समझ उबासी ले रहे थे 

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जो दब गया जमीं तले वो सत्य है

झूठ को खरा ठहराते सैकड़ों तथ्य है

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मित्र वही खरा है

घाव जिसने तुम्हारा भरा है

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-सुधीर बडोला

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