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अभिमान


शरारत की पुड़िया ग़ुस्ताख़ चंचल हो तुम

निर्मल स्वच्छ कितनी निश्छल हो तुम

दे धरा को भी राहत उस बादल सी तुम

आसमाँ में उड़ते रंग बिरंगी आँचल सी तुम

डोर साँसो की अपने पापा की परी हो तुम

अल्हड़ पवन सी मासूमियत से भरी हो तुम

 

मेरे घर का उजाला जैसे खिलखिलाती धूप

हुई जीवन में अवतरित तुम दिव्य देवी स्वरूप

जोड़े सभी को वो स्नेह का धागा हो तुम

उगते सूर्य किरण की मधुर आभा हो तुम

सौभाग्य मेरा तुमसे, मेरा अभिमान हो तुम

मानो ख़ुदा का सबसे बड़ा एहसान हो तुम

 

अंधकारमय उदासी में रोशनी का आभास हो तुम

चटकती धूप में शीतल हवा का एहसास हो तुम

मुस्कान से अपनी थकावट मेरी दूर करती हो तुम

मेरी हर उलझन हर चिंता को हरती हो तुम

सच कहूँ तेरे इर्द गिर्द ही मेरा संसार समाया

ज़िद्दी -गुस्सेल मासूम -नटखट तेरा हर रूप भाया

 

मेरे मन की आशंका कहूँ या समाज का असर

पता नहीं क्यूँ पर अक्सर था मन में एक डर

बनाकर दायरा चारों ओर मैंने तुम्हें उड़ने से रोका

लगाया बोलने पर अंकुश तो कभी पहनावे पे टोका

बिना बंदिश तू खुली हवा में जिए ये मेरी चाह थी

फिर भी बेड़ियों में जकड़ा क्यूँकि मुझे तेरी परवाह थी

 

ख़्वाबों में अपने भी देखूँ तेरे सपनों का घर

तेरी हर ख्वाहिश सर आँखो पर

ना घेरे उदासी तुझे कभी ना आँखें हों नम

रहे खिलती कली सी,ना ख़ुशियाँ हों कम

तेरे स्पर्श मात्र से होता मेरा जीवन सम्पन्न

ना जाने क्यूँ कहते लोग, पुत्री पराया धन

 

        - सुधीर बडोला

 

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