मुझ पर लाखों मरते थे जनाब।'s image
Poetry1 min read

मुझ पर लाखों मरते थे जनाब।

Sudha KushwahaSudha Kushwaha April 13, 2022
Share0 Bookmarks 52 Reads1 Likes

मुझ पर लाखों मरते थे।

पर यह दिल उस पर मर बैठा।

जो हमें ही मार बैठा।

मोहब्बत भी वह मौतें अंजाम है।

जिसके बाद कोई अंजाम नहीं आता।

दर्द जब अपने दिल में होता है जनाब।

तो उस दर्द को कम करने कोई नहीं आएगा।

जितना किसी के पीछे भागोगे।

वह उतना ही भागाएगा ।

वह हर घड़ी हर पल आपकी औकात दो कौड़ी की बताएगा।

कोई मर्द पैदा नहीं हुआ जो इस दिल पर मरहम लगाएगा।

शौक नहीं मुझे मर्दों का यह कौन बताएगा।

मुझ पर लाखों मरते थे।

पर यह दिल उस पर मर बैठा।

जो हमें ही मार बैठा है।

कैसे शिकायत करूं उससे ओ समंदर पार बैठा।

कोई बात नहीं है दिल हार बैठा।

मौत आई नहीं।

फिर भी यह दिल मार बैठा।

मैं किसी को दोस् नहीं देती।

बस अब यह दिल हार बैठा।

मैं किसी से शिकायत करूं तो कैसे।

बदले में वो खामोश बैठा।





अमृत की एक बूंद __सुधा

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts