बावरी मां।'s image
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माग सूनी उसकी।

सांवरा उसका रंग।

बावरी आंखें उसकी।

कुछ कहता उसका अक्स।

पीठ पर नन्हे ख्वाबों की ख्वाहिश लिए।

झुलसता उस् का बदन।

ममता की वह मूरत।

मासूम सी उसकी वह सूरत

किस्मत की मारी वह।

बिकती फिरती ममता सड़कों की दीवानी वह।

दर्द बांटने वाले कम दरिंदे ज्यादा मिल जाते हैं।

उसे देखकर गंदी अश्कों से मुस्कुराते हैं।

माग सूनी उसकी।

सांवरा उसका रंग।

चूड़ियां सिर्फ नाम की है। फिर भी बदन में चमक।

मन जैसे कुंदन हो। संतोष और स्वर में मिटास जैसे अरबों हो।

उस् मां की मुस्कान जैसे खरबों की हो।

जिसे खरीदने के लिए किसी की औकात ना हो।

चादर में लिपटी एक ख्वाहिश पीठ पर बांधे।

सर पर बोझ लिए। पीठ पर ममता है वहां।

खड़ी वह मां ईट ओ की भट्टी पर।

वह थकती कहां है।

बस खड़ी जिगर में फौलाद लिए।

माग सूनी उसकी।

सांवरा उसका बदन।

बावरी आंखें उसकी।

हाथों में चूड़ियां नहीं उसके।

आंखों पर पड़ रही है झुर्रियां।

फिर भी माथे पर एक शिकन तक नहीं।

उम्र तो ज्यादा नहीं उसकी।

पर जिंदगी ने उसे सिखाया बहुत है।

आम के पेड़ की छांव में बैठकर बस वह अपने कपड़े से खुद से पहले तेरा पसीना पोंछ रही है।

तेरे होठों से अपने होंठ लगाकर।

देखो उस् मां को ओ कितना सुकून महसूस हो कर रही है।

बस तुझसे एक ही बात कह रही है

ख्वाहिशों को सुना रखकर।

बस तुझे एक अच्छी परवरिश देने की कोशिश कर रही है।

तेरी मां तेरी खुशी के खातिर दुनिया से लड़ रही है।

हारेगी नहीं वह।

वह जीतने के लिए ही तो दिन रात भर रही है।









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