कलयुगी प्रेम's image
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तुम आ जाओ जैसे पतझड़ के बाद का सावन हो
यह अधूरा सा मन तुम से मिलकर ही पावन हो

ना गजरे की खुशबु ना पायल की छन छन
ना आखों में काजल ना होठों की लाली
ना चितवन सी थिरकन ना कानों में बाली

हो बारिश का मौसम यादें पुरानी 
चूल्हे की लकड़ी अकेले बुझानी

सावन सा यौवन और पेड़ों पे झूले 
कलयुग का प्रेमी कितनों को भूले... 

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