जाति-भेद's image
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जातिवाद निर्विवाद जंग करते रहिये

एकता का बीज भंग कर सकें तो करिये

दोषारोपण दूसरों पर व्यंग्य करते रहिये 

समाधान, प्रेमगान शब्द मत कहिये 


मानव को पथ का पता नहीं, पथ भ्रष्ट हुआ विचरण करता 

जीवन के रथ का पता नहीं, अश्वों पर दोष दमन करता 

"हैं एक सभी" का बोध नहीं, किस अहंकार पर रण करता 

दुंदुभि सहित रणभेरी लिए, रणकौशल पर मंथन करता 


जब जान हलक में जा अटकी, न जाति दिखी न धर्म दिखा  

जब दिखी मृत्यु आखेटक बन, न साम दिखा न दाम दिखा 

जब पड़ा आभावरुधिर का तब, मानव, पशु का न भेद दिखा 

तब रक्त वाहिका चीख पड़ी, न मान दिखा, न शान दिखा 

ये ऊँच-नीच, ये छुआ-छूत के रोग विनाशक होते हैं 

ये मानवता, जीवंत और सभ्यता कलंकित करते हैं 

हे मानव, हे निर्बुद्धि प्राण, हे वसुधा के मलीन कंटक 

ये जातिवाद और भेदभाव ओजस का नाश कर देते हैं  


हे वंशीधर हे मधुसूदन हे नटखट माखनचोर कृष्ण 

क्यों प्रेम किये तुम राधा से क्या प्रश्न किसी ने किया नहीं 

क्या कुल की मान और मर्यादा का भी तुमको तब पता नहीं 

क्या शान और सम्मान तुम्हारा भी समाज में घटा नहीं 


हे धनुर्धारी हे रघुनायक, मर्यादा के अनुपम उपवन 

भीलनी के जूठे बेर खात क्या लोक लाज का ख्याल नहीं

क्या भूल गए थे रघुनन्दन थे क्षत्रिय कुल के तुम वंशज 

या फिर सबरी के प्रेम भक्ति ने मिटा दिया था सब संशय


हे प्रेम प्रतिष्ठा के बैरी, मत युगलों का विध्वंश करो 

हे जाति धर्म के अनुयायी, परमेश्वर का संत्रास करो 

हे चक्रपाणि हे जगदीश्वर, मानवता को पल्लवित करो

आ जाओ धरा पर पुनः गढ़ो अवतार, भेद का त्रास हरो 

                                --------------------- 'भृगुवंशी' शिवेंद्र गिरि




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