शहर's image
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मैं छोड़ आया हूं उस शहर को उसकी बदहवासी में,
बिखरा हुआ दोगले और तिगले अधमरे इंसानों के रूप में 
और समेटा हुआ कहीं पर पुराने मकानों की कच्ची नींव 
में छोटी छोटी यादों का बालू बनकर 
ये शहर झूम उठता था हर सुबह पीकर रात के अंधेरों को 
तो कभी डूब जाता था उदासी में सांझ के सूरज के साथ 
आज मैं छोड़ आया हूं उसको गहरी उदासी में।

- विकाश शर्मा 

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