वो ख़्याल's image
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अक़्सर ख़्याल में तुम रूबरू होते हो मेरे,

एक लकड़ी की बैंच पे।

हम बैठे हैं सामने एक दूसरे के,और बातें वही ख़त वाली,जो हमेशा सिर्फ लिखी गई ...कही कभी नहीं..

लकड़ी की बैंच पे,लिए हाथों में चाय के प्याले।

मेरी कुछ शिकायतें, और वही तेरी सफाई,

अपनी उल्फ़त कुछ ऐसे थी हमने जताई...

आज नहीं समझूँगी मैं,तेरे इक़रार भरे आंखों के इशारे..आज कहना होगा तुम्हे ज़बान से...सारी वही बातें जो सिर्फ लिखी गई..कही कभी नही

लकड़ी की बैंच पे...दरमियाँ चाय के प्याले।

तेरी थोड़ी झिझक हटी,बात दोनों की आगे बढ़ी..

अबके तेरा हाथ मेरे कंधे तक आया....

बातें कही तूने,बिना देखे तुझे..मेरा सर तेरे सीने पे आया

बस अब यूँ ही ये ख़्याल क़ायम रहे ये प्यार रहे यहीं,यूँ ही...

लकड़ी की बैंच पे हम साथ और एक तरफ चाय के ये प्याले यूँ ही.....

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