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ग़म-ए-ज़िंदगी भुला बैठे हैं अब तो

sandysoilsandysoil June 16, 2020
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ग़म-ए-ज़िंदगी भुला बैठे हैं अब तो,

न जाम की तलब है, न साक़ी की।

बेचैन फिर क्यूँ हुए जाता है, दिल ये नादाँ,

सुना है जबसे, 

कि मयख़ाने फिर से जल्द ही महकने लगेंगे।


-संदीप गुप्ता SandySoil



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