कविता's image
0 Bookmarks 6 Reads0 Likes
एक कविता 

क्या सच में सब अच्छा होता,
गर सब अच्छा होता?

होती सारे ज़माने में सिर्फ़ खुशियाँ,
गम का न कोई नाम-ओ-निशाँ होता।

सब होते गर सिर्फ़ बुलन्दियों पर,
गिरना क्या है, क्या किसी को पता होता?

न कोई बीमारी,न दुःख,न दर्द,न तक़लीफ़,
कुछ भी न होती गर ज़माने में,
तो क्या किसी को ख़ुदा का पता होता?

गर होती ही न ये ज़मीं,
तो फिर आसमाँ किसे पता होता?

क्या सच में अच्छा होता,
गर सब अच्छा होता?

तुम्हें सुख़ की क़द्र ही न होती,
गर तुम्हें न दुःख का पता होता।

ना रुकते तुम्हारें पैर ज़मीं पर,
गर जो न ये आसमाँ होता।

गर होते सब सिर्फ़ अमीर,
मुफ़लिसी का ना तुम्हें पता होता।

इंसा को भी न होती क़द्र इंसा की,
दहर में जो ना नाम-ए-ख़ुदा होता।

गर होती ही ना रात जैसी शय दुनिया में,
दिन क्या है, किसी को न पता होता।

गर तुम्हें कुछ न पता होता,
तो सोचो तुम्हें क्या पता होता?

सच तो ये है कि गर सब अच्छा होता,
तो कुछ न अच्छा होता।

©- Salma Malik

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts