महिला's image
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किसी कुंज में कन्या होकर
घर की रौनक हो जाती है
माँ-बाबा की आँख का तारा
अब विद्यालय में नाम कमाती है
जैसे-जैसे लड़कपन छूटा
जग को खटकती जाती है
किसी रोज को जोड़ा पहने
वो ब्याहता हो जाती है
अब पति, बच्चे, घरबार सभी को
माँ जैसे ही निभाती है
काल का ये घटनाक्रम
औरत सब दिन निभाती है
फिर भी हर एक रूप में
वो बाखूब नजर आती है

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