तिरस्कार's image
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कुछ भी कहना सुनना बेमानी है,

यह दास्ताँ बडी पुरानी है,

कुछ भी मांगने से नही मिलता,

मिलता है कुछ तो तिरस्कार मिलता,

माँगकर अपने वजूद को ना ठुकराओ,

कभी मरुस्थल में फूल नहीं खिलता ।

इस अहंकार भरी दुनिया में,

हर जगह सौदागर हैं,

बेच देते हैं खडे बाजार में,

बिकने वाले को पता भी नहीं चलता ।।

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