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सांझ ढलते ही उदासी का आलम

बुझते आशाओं के दीप का अंधेरा

उगते सूरज से नवजीवन की आशा

सांझ ढलते ही खामोशी का घेरा ।

मायूसी और बेबसी में लिपटे ये चेहरे

जिनको रोटी के चंद टुकड़ों का सबब

उसको पाने के अरमानों में सुबह की लाली से

सांझ ढलते ही आंसुओं में डूबा हुआ लब ।।

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