रिश्तों का बाज़ार's image
Poetry1 min read

रिश्तों का बाज़ार

Roopali TrehanRoopali Trehan December 14, 2021
Share0 Bookmarks 28 Reads1 Likes

सुनता नहीं दिल की

कोई सिसकियाँ मगर

दिखावटी मुस्कुराहटों के

यहाँ सब ख़रीदार हैं

ना जाने कैसा ये

रिश्तों का बाज़ार है


पड़ता नहीं तनिक भी

फ़र्क किसी को किसी से

जज़्बात भी छुपे बैठे लाचार हैं

धीरे धीरे सिकुड़ता जाता

एहसासों का कारोबार है


अपनेपन का दावा करने वाले

हर शख़्स के हाथों होते

सबसे ज़्यादा वार हैं

इसीलिए तो इंसानियत भी

बैठी नित्यप्रति शर्मसार है

नित्यप्रति शर्मसार है

✍️✍️

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts