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दौर वो नजदीकियों का

मेलजोल का बीत गया

सफ़लता की दौड़ में

आज पैसा जीत गया


दौर वो अपनेपन का

दिली मोहब्बतें रूठ गईं

तुरपाई दिखावों की करते करते

जज़्बातों की सुई टूट गई


दौर वो स्नेह और मान का

बड़प्पन सारा किधर गया

रिश्तों के व्यापार में

प्यार हाथों से फिसल गया


द्वार खुले तरक्की के

बदकिस्मती फिर भी साथ रही

उठा जो हाथ सिर से बुजार्गों का

किस्मत से भी ठनी रही


एक दौर जो बीत गया

एक पल जो आज है

ज़माना जो गुज़र गया

उसका रूपांतरण आज है

✍️✍️

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