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घर की दुलारी

Ravi VermaRavi Verma June 9, 2022
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रस्में शायद ढेर सारी थी,
धूम धाम की भी पूरी तैयारी थी,
भोजन और इज्जत बट तो रहे थे दावत में,
फिर क्यों नजरें झुकाए,
खुशियों का समंदर अंदर दबाएँ,
बैठी चुपचाप घर की दुलारी थी।

पिता का गौरव आसमान पर था,
जो था घर कभी अब मकान भर था,
थी तो खुशियाँ जहान भर की पीछे गाड़ी में,
फिर वो क्यों नही इस जहान में,
जो कल तक दुलारी का जहान भर था।

ये समय ही कैसे आ गया था,
रिश्ता जो बराबरी का था,
उसमें खुशियों का अंतर कैसे छा गया था,
दुलारी का पलड़ा हल्का,
लादनी पड़ी उसमें खूब चीजे,
फिर भी रहेगा हमेशा हल्का,
ये कोई मूंछ वाला बता गया था।


सालों पहले बेटे पर बेटी चुनी थी,
किया मस्तक कितना ऊंचा,
बेटी भी खूब गूणी थी,
आज बेटी पर इज्जत को चुना है,
सहारा था जो, आज कैसे अनसुना है,

दौलत शोहरत चाकरी ने आज विजय पायी है,
पीछे छूट गया है,
जिसके लिए दुलारी ही सबसे बड़ी कमाई है,
आजाद ही चिड़िया अब तक,
बंधन बदलने ही जा रही है,
घर छूटने से ज्यादा,
इज्जत देने वाला छूटने पर ही
शायद आंसू बहा रही है।

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