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अंतस के तंत्रों की आवृत्ति , मिलकर दूर पटल पर 
मधुर राग बिखेरती ,
प्रतिध्वनियां आकर मन को बहलाती कभी ,
कभी मिलन के गीत छेड़ती ,
विकल विह्वल  मन कभी शून्य हो जाता,
डगमगाता कभी गिरता 
फिर अश्रुओं की ओस लाता ,
रेत के महलों के खंडहरों में विचरता ,
राग पीड़ा का निश्छल मन मे भरता ,
कभी कुछ तितलियां आकर 
सुनहरे रंग भरती ,
हंसती हंसाती नृत्य करके 
अट्टहास करती ,
कभी कुछ मंत्र पढ़ती फिर फूंक देती ,
कुछ पल सहजता के तीर 
नभ को तान देती ,
बांधकर एक स्नेह की डोर
फिर भाग जाती ,
न मिलन का सपना सजाती 
न प्रणय का कोई  संदेश ,
ये तो सब पहले टूटे थे
क्यों जान सके न ,
बना रहा कैसा अंदेश ,
अब तो तंत्रों की बारी थी 
टूटना ही लिखा था किस्मत में ,
आहत ही होना था मन मे ,
क्योंकि अब ये टूट चुके हैं 
क्योंकि अब ये टूट चुके है 
लेकिन कुछ कहता यह मन है 
फिर से कुछ कहता यह  मन है ,
कैसे टूटेंगे ये तंत्र 
इनमे न कोई कामना है
न उम्मीद, न कोई वासना है 
नही टूट सकते 
नही टूट सकते ,
क्योंकि इन आवृतियों को किसी और ने मिलाया है ,
क्योंकि इन आवृतियों को 
किसी और ने मिलाया है ।।


" जसवंत बुंदेला "

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