यादें 'माँ' की's image
OtherPoetry1 min read

यादें 'माँ' की

R N ShuklaR N Shukla January 5, 2022
Share0 Bookmarks 121 Reads1 Likes
वे यादें माँ की –
अन्तर्मन में उठती रहतीं
जाड़े की ओ रातें, 
भुलाये नहीं भूलतीं
माँ की सांसें –
मेरी सासों से मिलती रहतीं
चक्की चलती रहती...

घरर-घरर चलती रहती–
आँटे की चक्की...
जाँते की सुमधुर ध्वनि में–
माँ की वह मीठी-मीठी लोरी!

उसकी गोदी में सोये-सोये
तकता रहता था माँ के मुख को
दीये की टिम-टिम जलती बत्ती की लौ में
हँसता रहता, रोने भी लगता 
माँ चुप रखने को गीत सुनाती, गाती रहती, 
पाषाणों की चक्की से भी–
कितनी सुन्दर दर्दभरी वे ध्वनियाँ उठतीं!

वह 'माँ' ही थी जो कभी नहीं थकती थी।
कर्मों में निष्ठा!दमित प्रतीक्षा!इच्छा –
अपने सुख की तिलाञ्जलि देती चलती रहती

यह सोच, समय की धारा में–
चलता रहता हूँ!
जीवन-पथ पर चलते -बढ़ते 
जब थक सा जाता
माँ का वह सौंदर्य मुझे चलने को,
करता ही रहता प्रेरित
शायद माँ कह रही–अनवरत आगे बढ़ चल!
विश्राम भी कर औ' चलता ही चल

अब भी वो संगीत-गीत–
 मन के तारों को हैं झंकृत  करते !
 यादें हैं, आती रहती हैं
 माँ की वो बातें मन को भाती रहती हैं...

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts