नदी किनारे's image
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देखता हूँ रोज-रोज!

दूर….नदी किनारे–

एक पत्थर! 

उसपर बैठे हुए– 

एक लड़के को…

अपलक निहारता रहता है

नदी को, घण्टों…


रह-रहकर एक कंकड़–

फेंकता जाता है पर, नदी में नहीं 

अपने पीछे।


फिर शाम ढ़ल जाती;और वह–

भारी-भारी कदमों से,

बोझिल-मन–

लौट पड़ता है घर को..


क्या है उसके मन में?

ऐसे ही पूछ लिया!और–

वह एक फीकी मुस्कुराहट लिए

धीरे-धीरे चला गया


नदी पूरे वेग से बहती जा रही है

और वह!हर रोज….

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