जन–चित्र !'s image
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वह  उदास  !  कृशगात !
अस्थि-पञ्जर-सा जन है !

भूख !  आस ! तृषार्त !
चिंताओं से आकुल !
अवशेष मात्र जीवन है !

दैन्य की मरुभूमि बना  जो 
वह भारत का पीड़ित -जन है !

जिसके जीवन की, लय टूट चुकी है 
जीने की आशा, कब की छूट चुकी है !

धिक्कार हमें है अपने  –
बहुविध संसाधन पर !
जिस पर  इतना  हम  इतराते ,
अपनी करनी का ढ़ोल बजाते !

इन जन-चित्रों की हालत–
लख , मन मेरा आहत है !

क्षुद्र नहीं है  हृदय  हमारा ,
इसमें धरती का आकर्षण है !

इस निरावृत विक्षुब्ध हृदय में
गंगा  –  सा  उर्वर  जल है !

सींचूँगा इनके मरुस्थल-से हृद को
मन में अथाह सागर  का  जल है ।

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