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जिंदगी...


ये जो जिंदगी है साहब….

धरती नाम की पटरी पर दौड़ती रेलगाड़ी हैं साहब

जिसका अराइवल स्टेशन पहले आता है और departure बाद में


कितना ना समझ है ये इंसा

स्टेशन को समझ लेता है मकां


ए नादां इंसा तू चार किताबें पढ़कर

तू क्या ख़ाक समझ लेता है


Hahaha

चंद समान और सिक्कों को दौलत समझ लेता है


चिल्लरौ से ख़रीदी हैं जो

कुछ बची कुची सासें

उसको ताउम्र की मोहलत समझ लेता हैं


देकर दान…2

चिल्लर का

खुद को देवता समझ लेता है


यहीं से लिया है सब तूने

यहीं देकर जाएगा


धरती पे लेकर अवतार

भगवान भी क्या लेकर जा पाया हैं

ओ निर्लज्ज जो तू कुछ लेकर जाएगा


अपने मन से पहले द्वेष निकाल

तब ही किसी के मन में जाएगा


सबको अगर हसीं दी है तूने

तो ही हँसता हुआ जाएगा


नहीं जैसे रोते हुए आया था

बस रोते हुए जाएगा


रचना :पुष्पेंद्र पाल सिंह

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