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जिस रस्ते पर

Priyam DubeyPriyam Dubey September 12, 2022
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जिस रस्ते पर चलना था वो रस्ता खो चुका हूॅं मैं
कर दो ऐलान बस्ती में नाकाम हो चुका हूॅं मैं

हुई अब नींद भी दुश्मन नहीं है ख़्वाब भी आते
ऑंखें भी हैं धुॅंधलाई पलकें भिगो चुका हूॅं मैं

नहीं है ये कोई अंज़ाम ये है इब्तिदा-ए-ज़ीस्त
दिल में प्यास मंज़िल की अभी से बो चुका हूॅं मैं

नए रस्ते पे है चलना नए जलवे दिखाना है
जो मेरे ख़्वाब थे बिखरे सभी सॅंजो चुका हूॅं मैं

कहो अफ़्ताब से जाकर आए जल्दी आसमॉं पर
नहीं अब देर करना है बहुत देर सो चुका हूॅं मैं

नहीं जो कुछ भी हो बाक़ी सुख़न में फ़न तलाशूॅंगा
सुख़न में फ़न मिला मुझको सुख़न का हो चुका हूॅं मैं

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