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इधर क्या होश नहीं थे...

Priya KusumPriya Kusum September 30, 2021
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ऐसा क्या था उस बाग़ में जो इस बाग़ नहीं था

इधर क्या रंग नहीं थे, महक नहीं थी, ग़ुलाब नहीं था। 


चलो मान लिया कि हसीं है वो मुझसे लेकिन

इधर क्या जलवे नहीं थे, हया नहीं थी, शबाब नहीं था। 


बड़े शौक से उस शहर में बना लिया आशियाँ तुमने

इधर क्या यार नहीं थे, महफ़िल नहीं थी, आदाब नहीं था। 


उम्र में बड़ा है वो मुझसे, सो चुप रह गयी वरना

इधर क्या तेवर नहीं थे, ज़ुबाँ नहीं थी, जवाब नहीं था। 


तुमसे क्यों पूछ रही हूँ इतने सवाल, मैंने भी इश्क किया

इधर क्या होश नहीं थे, अक्ल नहीं थी, हिसाब नहीं था। 


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