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छोटी-सी बात

Priya KusumPriya Kusum October 6, 2021
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छोटी-सी बात का क्यों तुम फसाद बनाते हो

अपने गिरेबां में झाँका है कभी, 

जो औरों पर उंगलियां उठाते हो.


सुलझ सकता है जो दो मीठे बोल बोलकर

उस मसले में क्यों गाली-गलौच करते हो, 

क्यों वहां भी तू तड़ाक पर आते हो.


समझाया था सबने कि दिल ना लगाना 

पर ज़रा भी माने नहीं तुम, 

अब क्यों अपनी तन्हाई का उस पर इल्जाम लगाते हो. 

 

मेरा अपना तजुर्बा कहता है 

इस सौदे में नुकसान ही नुकसान है, 

तुम क्यों बेकार अपनी किस्मत आजमाते हो. 


पत्थर हो चुका है ये 

अब रहने दो तुम, 

क्या मोम समझकर इसे पिघलाते हो. 


वो किसी और ही पे मरती है 

क्या ये तुम रोज़ खुद को, 

आईने में देख इतराते हो. 


कितनी बार जी दुखाया मेरा

ज़माने भर में रुसवा मुझे करके, 

अब कौन सा हक़ मुझ पर जताते हो. 


जब कर सकते थे तब कुछ किया नहीं 

खोये रहे अपनी ही धुन में, 

समय निकल जाने पर अब क्यों पछताते हो. 


काट देगा एक दिन जीभ तुम्हारी ही 

जिसे बड़े गुरुर से सबको, 

तुम हीरा बताते हो. 


मुझे देखकर मुस्कुराते हो 

लगता है कि कुछ कहना चाहते हो, 

फिर मेरे पास आते ही चुप क्यों हो जाते हो 


शिकस्त पाना मन्ज़ूर नहीं मुझे 

पर वो जब तुम प्यार से देखते हो, 

मैं वहीं हार जाती हूँ, तुम वहीं जीत जाते हो. 


हर किसी से यों रूठ जाने की आदत नहीं 

तुमसे जान कर तकरार करती हूँ, 

अच्छा लगता है जैसे तुम मुझे मनाते हो. 


जान जाती है जब तुम नहीं आते 

जानते हो तुम ये बखूबी, 

फिर क्यों ना आकर मुझे सताते हो.


मान लो कि उम्र हो चली है तुम्हारी 

क्या अब भी बच्चों की तरह, 

कुल्फी देखकर ललचाते हो.


पल भर की है ये ज़िन्दगानी 

आज हैं.. कल चले जायेंगे 

इसमें भी क्या तुम हर पाई का हिसाब लगाते हो.


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