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“कैसे हार मान लूँ”

Prince TulsianPrince Tulsian October 23, 2022
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मैं कैसे हर मान लू 
ऐ ज़िंदगी 
कैसे हार मान लूँ

माना कि ज़िंदगी इम्तहान की तरह 
रोज़ मुझे बेचैन करती है सवालों से ..
माना कि कुछ सवाल ऐसी भी है 
जो मिलते नहीं मेरे ख़्यालों से ..
पर जवाब ना देने की फ़ितरत 
कहाँ मंज़ूर मेरे जिगर को ..
कैसे छोड़ दूँ लड़ना 
बिना आज़माए अपने हुनर को ..
तों कैसे हार मान लूँ 
ऐ ज़िंदगी 
मैं कैसे हर मान लूँ..

के बस थोड़ा लड़खड़ा गया ग़र
जाने अनजाने अगर ..
तो क्या हुआ अभी तो 
मेरा हौसला मरा नहीं तो ..
जज़्बे की एक और उड़ान लूँ..
मैं कैसे हार मान लूँ ..
ऐ ज़िंदगी 
कैसे हार मान लूँ..

के नहीं हुआ सोचा जैसा 
होता कहा हर कुछ वैसा ..
जो है हम चाहते 
अभी तो है कई और रास्ते …
हाँ खींच ही लाएँगे राहतें
कुछ पूरी अधूरी चाहते ..
कस करते बांध लूँ
कैसे हार मान लूँ ..
ऐ ज़िंदगी 
मैं कैसे हार मान लूँ.

थोड़ा हौसला अफजाई तो 
खुद भी करनी होती है ..
आंसू पूछने हमारे 
हरदम आता नहीं कोई है ..
माना कि बीती है 
थोड़ी उम्र, थोड़ी जवानी ..
पर यें तो बस है मेरी 
अधूरी सीं कहानी …
मुट्ठी में समेट के 
डोर हिम्मत की बांध लूँ …
कैसे हार मान लूँ 
ऐ ज़िंदगी 
मैं कैसे हार मान लूँ…

ये जीवन रंगमंच सा है 
बस एक पर्दा गिरा है …
तो उठेगा फिर जगमगाएगा 
मेरा हौसला कैसे मिट जाएगा …
अभी तो बहुत किरदार निभाने है 
दम ख़म फिर से आज़माने है …
ज़िद्द जितने की है ऐसी की 
मन हार कहा माने है …
तो कैसे हार मान लूँ 
ऐ ज़िंदगी 
मैं कैसे हार मान लूँ …

जय हो

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