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पलाश का अंत ( रिक्तता )

Prayas KothariPrayas Kothari March 1, 2022
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मार्च,


ऋतुओं का बरसना आरम्भ हो चुका हैं वह कभी भी मेरे आंँगन में बरसती होंगी। घड़ी की सुई इन्तजार के साथ अपने जीवन के अंतिम परिभ्रमण में आती ही होगी। पेड़ों पर पलाश अपने पैर जमाता ही होगा। खिड़की में उसकी खुशबू महकने को उत्सुक होगी। जूते कीचड़ की ओर आकर्षित होते होंगे। पलाश की छाया मुझे अपने अंदर समेटने के लिए तत्पर होगी।


हीरे की उत्कृष्टता देखनी हो तो मैं सबसे पहले पलाश के साथ देखना चाहता हूंँ लेकिन सिर्फ सफेद पलाश के साथ। पलाश के फूल में कोई कैसे भेदभाव कर पाता है लेकिन यह मुझे उस सफेद पलाश को देखने पर पता चला, जब उसकी सुगन्ध ने मुझे मेरी खिड़की के पास खींचा। यह पलाश मेरे लिए सकारात्मक रहा।


पिताजी ने जब यह आंँगन में लगाया तब सिर्फ बताया कि यह सुगन्धित है लेकिन कल्पनाओं के परे, मैं इसमें तब तक पानी देता रहा जब तक पिताजी अपने हाथों से मुझसे यह करवाते लेकिन पिताजी के जाने के साथ मुझे यह उतना ही नापसंद था जितना कि किसी बच्चे को अपना स्कूल।


पिताजी ने कहा था "आकर्षक चीज़ें और गूढ़ व्यक्तित्व पाथेय के वे कण है जिन्हें समझने में हमें जीवन दान करना पड़ता है"। मैं पिताजी की बातों से अक्सर ऊँघता रहता। आखिर नादान बच्चे और मरा हुआ मन जब कोई कार्य किया करते है तो उनसे हुई गलतियांँ हमें एक सीख देती है।


पिताजी के लिए नादान बच्चा पलाश था और मरा हुआ मन 'मैं' स्वयं। मैं ऋतुओं से कुछ नहीं सीख पाया, वे किस तरह आती हैं जीवन में रंग बिखेरती हैं, चंचल मन को विकसित करती हैं और एक नया अध्याय आरंभ करती हैं। लोग कहते है कि इस सफेद फूल से मन के मरे मनुष्य को क्रियाशील बनाया जा सकता है। पिताजी मुझे जिंदा करना चाहते थे या फिर स्वयं को सांत्वना।


पिताजी इसमें रोज पानी देते और इसकी मुस्कुराहटों को अपने अंदर लदा हुआ पाते है। मेरी आँखें उन सफेद गिरते हुए हीरों पर टकटकी लगाए रहती हैं। " करिश्में सुनें सुनाए हो तो उन पर विश्वास करना आसान होता हैं किन्तु वह प्रत्यक्ष रूप से आपके सामने रहें तो वह स्वपन बन जाता है।" यह भी कुछ इस तरह मेरे जीवन में रहा।


समय का पहिया अपनी द्रुत गति के साथ सदैव मनुष्य को पीछे छोड़ता रहा है। "मनुष्य नहीं चाहता समय रूपी पहिए से आगे निकलना, वह चाहता है वह इस पहिए पर बैठा रहें और तथाकथित निर्देश देता रहें।"


पिताजी समय के पहिए से पीछे रहें लेकिन पलाश समय के साथ रहा फला-फूला एवम् अंतत: झड़ गया। मैं पिताजी के पहले बच्चे जैसा नहीं बन पाया। अब यह पलाश मुझे अपनी और आकर्षित करता रहता है, मुझे लेने के लिए कभी अपनी सुगन्ध तो कभी अपने वस्त्र रूपी फूलों को मेरे ऊपर बरसा कर अपने समीप आमंत्रित करता हैं।


मैंने कभी नहीं समझा आखिर एक मनुष्य किसी फूल के सहारे जीवित कैसे रह सकता हैं, फूल हमें खुशबू दे सकते हैं, फल दे सकते हैं किन्तु जीवन। इस पहेली के सुलझने का, मैं जीवन भर इन्तजार करता रहूंँगा।



" ऋतुएंँ, जीवन को विकसित करने में उतनी सहायक है जितना कि एक पिता, बच्चे के जीवन को विकसित करता है। "


- प्रयास


( तसवीर गूगल से )

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